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सोमवार, 6 अक्टूबर 2008

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गुरुवार, 11 सितंबर 2008

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नींंम का पेड
आसमां में आग बरसा रहा है सूरज,
फैल रही है लू की
लपटेंऔरउठ रही हैगर्म हवा की
धूलमेघ लेकर नहीं लौटा,
आषाढ़ का पहला दिन।तपती धरतीऔरधुआं-धुआं आसमां के बीचजीवन
भट्टी की भाति ,
धधकता प्रचंड गर्मी में जीवन,
डीहाइड्रेशन का शिकार हो रहा,
ऐसे मेंगांव का नीम का पेड़ की छा़वजो राहत दे रहा ।
अन्तरमन

सोचता हूँ ,
क्या है अन्तरमन ?
औरक्या
है बाह्यमन?
मन तो है-केवल मन,
चंचल है,
उच्छल है,
एकाग्र है,
गंभीर है।मेरा मन ,
तेरा मन।
समर्पण......
जी करताउनमुक्त गगन में उड़ चलूँ,
तुम्हारे सुर्ख होंठों पे,
अपने होठ धरूँ।
जी करतातुम्हें बाहों में भरू,
और
मुट्ठी भीच ,
तुम्हें अपने में समेट लूँ।
जी करतातुम्हारी सांसंो की महक,
अपने सीने में भरूं,
कुछ कदम साथ चलूँ,
और संग कुछ कदम रोक लूं।
एहसास करता हूँ-
तुम मेरी हर चाहत पर ,
एक लकीर खीच देती,
हर एक रोज,
कल का वादा कर,
कुछ बंदिशें याद दिला देती,
ये नासमझइतना तो
payarसमर्पण हैएक हो जाने का ,
ना ही लकीर,
ना ही बंदिशों का।
रिमझिम-रिमझिमकिश्तों -किश्तों में बारिश,
नई स्फूर्ति,
नया उत्साह ,
एकदम धुला-धुला सा आसमां,
एक मुट्ठी किरण,कुछ सौधी सी ,
मिट्टी की महक,
मन जागा-जागा सा,
कुछ और नहीं ,
ये आगमन है,बारिश का।।
रिमझिम-रिमझिमकिश्तों -किश्तों में बारिश,
नई स्फूर्ति,नया उत्साह ,
एकदम धुला-धुला सा आसमां,
एक मुट्ठी किरण,
कुछ सौधी सी ,
मिट्टी की महक,
मन जागा-जागा सा,
कुछ और नहीं ,
ये आगमन है,बारिश का।।
चौराहे पर जिंदगी

चौराहे के किनारे बिखरी है जिंदगी,
देखता हूँ तीन-चार बंजारन बढ़ी औरत,
जिनके चेहरे पर,बिखरी हैं झुर्रियां,
रोड डिवाइडर पर बैठ बिस्कुट खाती ,
और मैंउनके चेहरे की उभरी लकीरों को पढ़ने की कोशिश करता,
कुछ दूर आगे देखता,कुछ काली,
कुछ सांवली,जवान होती लड़कियां,
छीटदार घाघरा ,
बड़ी कमीज पहने,अपनी लज्जा अखबार से छुपाये,
अखबार ही बेचती,
देखता बारीक नजरों से,
सड़क से गुजरते उन राहगीरों को ,
जिनकी नजर अखबार पर कम और उनके कमीज के टूटे बटन के बीच झांकते नाभि पर ज्यादा रहती
।सूर्य प्रकाश जी की कलम से

देखता हूँ मैं............

थैला थामे ,
बाजार जाते समय देखता,
पांचवी तक पढ़ी पिकी को,
शाम के वक्त,
शायद उसकी मां ने ,पिंकी के बालों कोहरे रंग क फीते से बांधी होगी,
औरआखों में काजल की हो।
सड़क के किनारे ,लकड़ी के सहारे लगी दुकान,
जिसे कुछ ईटों ने सहारा दे रखा थआ।
वहकपड़ों की गठरी खोलती ,
कमीज की बांह को पलटती,
पानी छ़िडकती ,
जलती लकड़ी की धीमी आँच,
और
धुआँ देती इर्त्री से,
चुमड़ी कमीज को सीधा करती।
शायद उसकी भी सिकुड़ती जिंदगी को कोई ऐसे ही सवारे।
देखातायादाव
की चाय की दुकान को,
जहां बिखरी है ,३-४ प्लास्टिक के स्टूल ,
और
एक बोरा बेंच पर बिछा हुआ,
कुछ किशोर,
कुछयुवा लड़को को,
जो सिगरेट के धुएंऔर गुटके के पीक के बीचबहस करते नौकरी,
पैसा औरदेश की हालत पर,
और
बीच-बीच में नजर गड़ाये पिंकी के उभार परशायादाचाय के साथजरूरत पींकी की भी हो।
सूर्य प्रकाश जी की कलम से।