समर्पण......
जी करताउनमुक्त गगन में उड़ चलूँ,
तुम्हारे सुर्ख होंठों पे,
अपने होठ धरूँ।
जी करतातुम्हें बाहों में भरू,
और
मुट्ठी भीच ,
तुम्हें अपने में समेट लूँ।
जी करतातुम्हारी सांसंो की महक,
अपने सीने में भरूं,
कुछ कदम साथ चलूँ,
और संग कुछ कदम रोक लूं।
एहसास करता हूँ-
तुम मेरी हर चाहत पर ,
एक लकीर खीच देती,
हर एक रोज,
कल का वादा कर,
कुछ बंदिशें याद दिला देती,
ये नासमझइतना तो
payarसमर्पण हैएक हो जाने का ,
ना ही लकीर,
ना ही बंदिशों का।

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