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गुरुवार, 11 सितंबर 2008


देखता हूँ मैं............

थैला थामे ,
बाजार जाते समय देखता,
पांचवी तक पढ़ी पिकी को,
शाम के वक्त,
शायद उसकी मां ने ,पिंकी के बालों कोहरे रंग क फीते से बांधी होगी,
औरआखों में काजल की हो।
सड़क के किनारे ,लकड़ी के सहारे लगी दुकान,
जिसे कुछ ईटों ने सहारा दे रखा थआ।
वहकपड़ों की गठरी खोलती ,
कमीज की बांह को पलटती,
पानी छ़िडकती ,
जलती लकड़ी की धीमी आँच,
और
धुआँ देती इर्त्री से,
चुमड़ी कमीज को सीधा करती।
शायद उसकी भी सिकुड़ती जिंदगी को कोई ऐसे ही सवारे।
देखातायादाव
की चाय की दुकान को,
जहां बिखरी है ,३-४ प्लास्टिक के स्टूल ,
और
एक बोरा बेंच पर बिछा हुआ,
कुछ किशोर,
कुछयुवा लड़को को,
जो सिगरेट के धुएंऔर गुटके के पीक के बीचबहस करते नौकरी,
पैसा औरदेश की हालत पर,
और
बीच-बीच में नजर गड़ाये पिंकी के उभार परशायादाचाय के साथजरूरत पींकी की भी हो।
सूर्य प्रकाश जी की कलम से।

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