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गुरुवार, 11 सितंबर 2008

चौराहे पर जिंदगी

चौराहे के किनारे बिखरी है जिंदगी,
देखता हूँ तीन-चार बंजारन बढ़ी औरत,
जिनके चेहरे पर,बिखरी हैं झुर्रियां,
रोड डिवाइडर पर बैठ बिस्कुट खाती ,
और मैंउनके चेहरे की उभरी लकीरों को पढ़ने की कोशिश करता,
कुछ दूर आगे देखता,कुछ काली,
कुछ सांवली,जवान होती लड़कियां,
छीटदार घाघरा ,
बड़ी कमीज पहने,अपनी लज्जा अखबार से छुपाये,
अखबार ही बेचती,
देखता बारीक नजरों से,
सड़क से गुजरते उन राहगीरों को ,
जिनकी नजर अखबार पर कम और उनके कमीज के टूटे बटन के बीच झांकते नाभि पर ज्यादा रहती
।सूर्य प्रकाश जी की कलम से

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